शुक्रवार, 25 जुलाई 2008

हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफ़िर की तरह

ग़ज़ल: ग़ज़ल "हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफ़िर की तरह"
ग़ुलाम अली

6 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लागजगत में आपका स्वागत है और हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार में अपना अमूल्य योगदान दे.

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  2. भई, आप कमाल की चीज़ लाये हैं. स्वागत है आपका.

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  3. स्वर सृजन एक बहुत ही सुन्दर प्रयास है। गज़ल सुनकर आनन्द आगया। आशा है आनन्द की यह गंगा यूँ ही प्रवाहित होती रहेगी। इतने सुन्दर प्रयास के लिए हृदय से बधाई।

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  4. एकदम नयी गझल सुनवाने का शुक्रिया । स्वागत है ।

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  5. हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.

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  6. आपका विचार बहुत उन्दा है, कुछ ऐसा ही प्रयास है हमारा भी "आवाज़" के मध्यम से, यहाँ भी पधारें http://podcast.hindyugm.com/ पर


    आपको नए ब्लॉग की बधाई, बेहद सराहनीय प्रयास है आपका.
    सक्रिय लेखन से हिन्दी चिट्टा जगत को समृद्ध करें.

    आपका मित्र -
    सजीव सारथी,
    9871123997

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