सोमवार, 28 जुलाई 2008

न जाने कब वो पलट आएं, घर खुला रखना



इफ़्तिखार 1:

न जाने कब वो पलट आएं, घर खुला रखना

कवि: इफ़्तिखार नसीम इफ़्ती

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