गुरुवार, 19 नवंबर 2009

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

शब को मेरा जनाज़ा जायेगा यूँ निकलकर…मुन्नी बेगम

शब को मेरा जनाज़ा जायेगा यूँ निकलकर
रह जायेंगे सहर तक दुश्मन भी हाथ मलकर
गायिका: मुन्नी बेगम

रविवार, 15 नवंबर 2009

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

मुझे फूल सब्र करने…मुन्नी बेगम

मुझे फूल सब्र करने मुझे बाग़बाँ भुला्दे
के क़फ़स में तंग आकर मेरे और हैं इरादे

गायिका: मुन्नी बेगम

बुधवार, 11 नवंबर 2009

सोमवार, 9 नवंबर 2009

शनिवार, 7 नवंबर 2009

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

बुधवार, 4 नवंबर 2009

सोमवार, 2 नवंबर 2009

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009

सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

क्यूँ करते हो हैरान प्रीतम फूल कहाँ से लाऊँ…नैयरा नूर

क्यूँ करते हो हैरान प्रीतम फूल कहाँ से लाऊँ
मै अकेली बोलो अब किसके बाग़ में जाऊँ
गायिका: नैयरा नूर

तेरी मौजूदगी में तेरी दुनिया कौन देखेगा…मुन्नी बेगम

मुन्नी

तेरी मौजूदगी में तेरी दुनिया कौन देखेगा

तुझे मेले में सब देखेगें मेला कौन देखेगा

गायिका: मुन्नी बेगम

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

ठाकुर का कुँआ- कहानी प्रेमचन्द

ठाकुर

दलित जीवन की त्रासदी पर आधारित प्रस्तुत कहानी हिन्दी की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है।

कहानीकार : प्रेमचन्द

स्वर : मेराज अहमद

ठाकुर का कुआँ

जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई। गंगी से बोला-यह कैसा पानी है? मारे बास के पिया नहीं जाता। गला सूखा जा रहा है और तू सड़ा पानी पिलाए देती है!

गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी। कुआं दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था। कल वह पानी लायी, तो उसमें बू बिलकुल न थी, आज पानी में बदबू कैसी! लोटा नाक से लगाया तो सचमुच बदबू थी। जरुर कोई जानवर कुएँ में गिरकर मर गया होगा, मगर दूसरा पानी आवे कहां से?

ठाकुर के कुंए पर कौन चढ़नें देगा? दूर से लोग डाँट बताएँगे। साहू का कुआँ गाँव के उस सिरे पर है, परन्तु वहाँ कौन पानी भरने देगा? कोई कुआँ गाँव में नहीं है।
जोखू कई दिन से बीमार हैं। कुछ देर तक तो प्यास रोके चुप पड़ा रहा, फिर बोला-अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता। ला, थोड़ा पानी नाक बंद करके पी लूं।

गंगी ने पानी न दिया। खराब पानी से बीमारी बढ़ जाएगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देने से उसकी खराबी जाती रहती हैं। बोली-यह पानी कैसे पियोंगे? न जाने कौन जानवर मरा हैं। कुएँ से मै दूसरा पानी लाए देती हूँ।

जोखू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा-पानी कहाँ से लाएगी?

ठाकुर और साहू के दो कुएँ तो हैं। क्यों एक लोटा पानी न भरन देंगे?

हाथ-पांव तुड़वा आएगी और कुछ न होगा। बैठ चुपके से ब्राहम्ण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक का पांच लेगें। गरीबी का दर्द कौन समझता हैं? हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झाँकनें नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएँ से पानी भरने देंगें।?

इन शब्दों में कड़वा सत्य था। गंगी क्या जवाब देती, किन्तु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया ।

2

रात के नौ बजे थे।। थके-माँदे मजदूर तो सो चुके थें, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पाँच बेफिक्रे जमा थें मैदान में। बहादुरी का तो न जमाना रहा है, न मौका। कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं। कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार से एक खास मुकदमे की नकल ले आए । नाजिर और मोहतिमिम, सभी कहते थें, नकल नहीं मिल सकती। कोई पचास माँगता, कोई सौ। यहाँ बे-पैसे-कौड़ी नकल उड़ा दी। काम करने ढँग चाहिए।

इसी समय गंगी कुएँ से पानी लेने पहुँची।

कुप्पी की धुँधली रोशनी कुएँ पर आ रही थी। गंगी जगत की आड़ मे बैठी मौके का इंतजार करने लगी। इस कुँए का पानी सारा गाँव पीता हैं।। किसी के लिए रोका नहीं, सिर्फ ये बदनसीब नहीं भर सकते ।

गंगी का विद्रोही दिल रिवाजी पाबंदियों और मजबूरियों पर चोटें करने लगा-‘हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊचें हैं? इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं? यहाँ तो जितने है, एक-से-एक छँटे हैं।। चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें। अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिए की भेड़ चुरा ली थी और बाद में मारकर खा गया।। इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते हैं। काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है। किस-किस बात में हमसे ऊँचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊँचे है, हम ऊँचे।। कभी गाँव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आँख से देखने लगते हैं। जैसे सबकी छाती पर साँप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊँचे हैं!’

कुएँ पर किसी के आने की आहट हुई।। गंगी की छाती धक-धक करने लगी। कहीं देख ले तो गजब हो जाए । एक लात भी तो नीचे न पड़े उसाने घड़ा और रस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अँधरे साए में जा खड़ी हुई । कब इन लोगों को दया आती है किसी पर! बेचारे महगू को इतना मारा कि महीनो लहू थूकता रहा। इसीलिए तो कि, उसने बेगार न दी थी। इस पर ये लोग ऊँचे बनते हैं?

कुएँ पर स्त्रियाँ पानी भरने आयी थी। इनमें बात हो रही थीं ।

खाना खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओं। घड़े के लिए पैसे नहीं है।

हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती हैं।

हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियाँ ही तो हैं।

लौंडिया नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं? दस-पाँच रुपये भी छीन-झपटकर ले ही लेती हो। और लौंडिया कैसी होती हैं?
मत जलाओं, दीदी! छिन-भर आराम करने को तो जी तरसकर रह जाता है। इतना काम किसी दूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती। ऊपर से वह एहसान मानति! यहॉं काम करते-करते मर जाओं, पर किसी का मुँह ही सीधा नहीं होता।

दानों पानी भरकर चली गई, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुएँ की जगत के पास आयी। बेफिक्रे चले गऐ थें। ठाकुर भी दरवाजा बंदर कर अंदर आँगन में सोने जा रहे थें। गंगी ने क्षणिक सुख की साँस ली। किसी तरह मैदान तो साफ हुआ। अमृत चुरा लाने के लिए जो राजकुमार किसी जमाने में गया था, वह भी शायद इतनी सावधानी के साथ और समझ्-बूझकर न गया हो। गंगी दबे पाँव कुएँ की जगत पर चढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ ।

उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला। दाएँ-बाएँ चौकन्नी दृष्टी से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रु के किले में सूराख कर रहा हो। अगर इस समय वह पकड़ ली गई, तो फिर उसके लिए माफी या रियायत की रत्ती-भर उम्मीद नहीं। अंत मे देवताओं को याद करके उसने कलेजा मजबूत किया और घड़ा कुऍं में डाल दिया ।

घड़े ने पानी में गोता लगाया, बहुत ही आहिस्ता। जरा-सी आवाज न हुई। गंगी ने दो-चार हाथ जल्दी-जल्दी मारे। घड़ा कुएँ के मुँह तक आ पहुँचा। कोई बड़ा शहजोर पहलवान भी इतनी तेजी से न खींच सकता था।
गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखे कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाजा खुल गया। शेर का मुँह इससे अधिक भयानक न होगा।

गंगी के हाथ रस्सी छूट गई। रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं ।

ठाकुर कौन है, कौन है? पुकारते हुए कुएँ की तरफ जा रहे थें और गंगी जगत से कूदकर भागी जा रही थी ।

घर पहुँचकर देखा कि जोखू लोटा मुंह से लगाए वही मैला गंदा पानी पी रहा है।

*

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

सितम भि सहना, दुआ भी देना- मुन्नी बेगम की आवाज़

सितम

सितम भी सहना, दुआ भी देना।

है बेबसी का गया ज़मान॥

अगर है जुर्रत, गिराओ बिजली।

बना रहा हूं नया ठिकाना॥

शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

हाथ दिया उसने मेरे हाथ में- मुन्नी बेगम

मुन्नी

हाथ दिया उसने मेरे हाथ में।

मैं तो वली बन गया इक रात मे॥

इश्क़ बुरी शै सही पर दोस्त।

दख्ल न दो तुम मेरी हर बात में॥

गायिका: मुन्नी बेगम

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

कहानी…मोहन राकेश

मलबे का मालिक

आज़ादी के बाद लिखी गयी हिन्दी कहानियोँ में मलबे का मालिक अत्यन्त महत्वपूर्ण कहानी है। भारत विभाजन की त्रासदी पर आधारित इस कहानी के बिना नई कहानियों की चर्चा पूरी हो ही नहीं सकती है।

कहानीकर:मोहन राकेश

स्वर:मेराज अहमद

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

अपना है तू बेगाना नहीं मैंने तुझे पहचाना नहीं…मोहम्मद रफ़ी

अपना है तू बेगाना नहीं मैंने तुझे पहचाना नहीं
यह सच है अफ़साना नहीं मैंने तुझे पहचाना नहीं

गायक: मोहम्मद रफ़ी
फ़िल्म:महबूब की मेंहदी

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

दिल के झरोके में तुझको बिठाकर…मोहम्मद रफ़ी


दिल के झरोके में तुझको बिठाकर
यादों को मैं तेरी दुल्हन बनाकर
रक्ख़ूंगा मैं दिल के पास
मत हो मेरी जां उदास

गायक: मोहम्मद रफ़ी
फ़िल्म:ब्रह्मचारी

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

तुम इतना जो मुसकुरा रहे हो- फ़िल्म: अर्थ

अर्थ
तुम इतना जो मुसकुरा रहे हो क्या गम हैजो छिपा रहे हो
आंखो में नमी हंसी लबों पर क्या हाल क्या दिखा रहे हो

फ़िल्म: अर्थ
गायक: जगजीत सिंह

बुधवार, 25 मार्च 2009

मंगलवार, 24 मार्च 2009

फिर छिडी रात बात फूलों की-ग़ज़ल: रात फूलों की

फूल
फिर छिडी रात बात फूलों की रात है या बारात फूलों की
फूल के हार फूल के गजरे शाम फूलों की रात फूलों की

ग़ज़ल:रात फूलों की
गायिका/ गायक: लता मंगेशकर, तलत अज़ीज़

सोमवार, 23 मार्च 2009

गुरुवार, 19 मार्च 2009

बुधवार, 18 मार्च 2009

मंगलवार, 17 मार्च 2009

पूस की रात--कहानी…प्रेमचन्द



पूस की रात

हल्कू ने आकर स्त्री से कहा-सहना आया है। लाओ, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे।

मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली-तीन ही रुपये हैं, दे दोगे तो कम्बल कहॉँ से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी ? उससे कह दो, फसल पर दे देंगें। अभी नहीं।

हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रहा। पूस सिर पर आ गया, कम्बल के बिना हार मे रात को वह किसी तरह सो नहीं सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियॉं देगा। बला से जाड़ों मे मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी। यह सोचता हुआ वह अपना भारी-भरकम डील लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिद्ध करता थाद) स्त्री के समीप आ गया और खुशामद करके बोला-दे दे, गला तो छूटे। कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूंगागा। 

मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और ऑंखें तरेरती हुई बोली-कर चुके दूसरा उपाय! जरा सुनूँ तो कौन-सा उपाय करोगे? कोई खैरात दे देगा कम्बल? न जाने कितनी बाकी है, जों किसी तरह चुकने को ही नहीं आती। मैं कहती हूं, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते? मर-मर काम करो, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुटटी हुई। बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ हैं। पेट के लिए मजूरी करो। ऐसी खेती से बाज आये। मैं रुपयें न दूँगी, न दूँगी।

हल्कू उदास होकर बोला-तो क्या गाली खाऊँ?

मुन्नी ने तड़पकर कहा-गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है?
मगर यह कहने के साथ् ही उसकी तनी हुई भौहें ढ़ीली पड़ गई। हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भॉँति उसे घूर रहा था । 

उसने जाकर आले पर से रुपये निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए। फिर बोली-तुम छोड़ दो अबकी से खेती। मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी। किसी की धौंस तो न रहेगी । अच्छी खेती है! मजूरी करके लाओ, वह भी उसी में झोंक दो, उसपर धौंस।

हल्कू ने रुपयें लिये और इस तरह बाहर चला, मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हो । उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-काटकर तीन रुपये कम्बल के लिए जमा किए थे। वह आज निकले जा रहे थे। एक-एक पग के साथ उसका मस्तक अपनी दीनता के भार से दबा जा रहा था ।


2

पूस की अँधेरी रात! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ऊंख के पत्तों की एक छपरी के नीचे बॉस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा कॉप रहा था । खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता झबरा पेट मे मुँह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था। दो म से एक को भी नींद नहीं आ रही थी । 

हल्कू ने घुटनियों को गरदन में चिपकाते हुए कहा-क्यों झबरा, जाड़ा लगता है? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहॉँ क्या लेने आये थे ? अब खाओं ठंड, मै क्या करूँ? जानते थ, मैं यहॉँ हलुआ-पूरी खाने आ रहा हूँ, दोड़े-दौड़े आगे-आगे चले आये । अब रोओ नानी के नाम को । 

झबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलायी और उसकी कूँ-कूँ को दीर्घ बनाते हुए हल्कू ने कहा-कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे। यह रांड पछुआ न जाने कहाँ से बरफ लिए आ रही हैं। उठूँ, फिर एक चिलम भरूँ। किसी तरह रात तो कटे! आठ चिलम तो पी चुका। यह खेती का मजा हैं! और एक भागवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा आए तो गरमी से घबड़ाकर भागे। मोटे-मोटे गददे, लिहाफ, कम्बल। मजाल है, जाड़े का गुजर हो जाए। तकदीर की खूबी! मजूरी हम करें, मजा दूसरे लूटें!

हल्कू उठा, गड्ढ़े मे से जरा-सी आग निकालकर चिलम भरी । झबरा भी उठ बैठा । 

हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा-पिएगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता हैं, हॉँ जरा, मन बदल जाता है।

झबरा ने उनके मुँह की ओर प्रेम से छलकती हुई ऑंखों से देखा।

हल्कू-आज और जाड़ा खा ले। कल से मैं यहाँ पुआल बिछा दूँगा। उसी में घुसकर बैठना, तब जाड़ा न लगेगा ।

झबरा ने अपने पंजो को उसकी घुटनियों पर रख दिए और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया। हल्कू को उसकी गर्म सॉस लगी ।

चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके लेटा कि चाहे कुछ हो अबकी सो जाऊँगा, पर एक ही क्षण में उसके हृदय में कम्पन होने लगा। कभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट, पर जाड़ा किसी पिशाच की भॉँति उसकी छाती को दबाए हुए था ।

जब किसी तरह न रहा गया, उसने झबरा को धीरे से उठाया और उसके सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया। कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ रही थी, पर वह उसे अपनी गोद में चिपटाए हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था । झबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न थी। अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले न लगाता। वह अपनी दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा को पहुंचा दिया। नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था । 

सहसा झबरा ने किसी जानवर की आहट पाई । इस विशेष आत्मीयता ने उसमें एक नई स्फूर्ति पैदा कर दी थी, जो हवा के ठंडें झोकों को तुच्छ समझती थी। वह झपटकर उठा और छपरी से बाहर आकर भूँकने लगा। हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया, पर वह उसके पास न आया। हार मे चारों तरफ दौड़-दौड़कर भूँकता रहा। एक क्षण के लिए आ भी जाता, तो तुरंत ही फिर दौड़ति। कर्त्तव्य उसके हृदय में अरमान की भाँति ही उछल रहा था ।

3

एक घंटा और गुजर गया। रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरु किया।
हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई, ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया हैं, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रही है। उसने झुककर आकाश की ओर देखा, अभी कितनी रात बाकी है! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े। ऊपर आ जाऍंगे तब कहीं सबेरा होगा। अभी पहर से ऊपर रात हैं ।

हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर आमों का एक बाग था । पतझड़ शुरु हो गई थी। बाग में पत्तियो को ढेर लगा हुआ था। हल्कू ने सोचा, चलकर पत्तियों बटोरूँ और उन्हें जलाकर खूब तापूँ। रात को कोई मुझें पत्तियों बटारते देखे तो समझे, कोई भूत है। कौन जाने, कोई जानवर ही छिपा बैठा हो, मगर अब तो बैठे नहीं रह जाता ।

उसने पास के अरहर के खेत मे जाकर कई पौधे उखाड़ लिए और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिये बगीचे की तरफ चला। झबरा ने उसे आते देखा, पास आया और दुम हिलाने लगा ।
हल्कू ने कहा-अब तो नहीं रहा जाता झबरू। चलो बगीचे में पत्तियां बटोरकर तापें। टॉटे हो जाऍंगे, तो फिर आकर सोऍंगें। अभी तो बहुत रात है। 

झबरा ने कूँ-कूँ करें सहमति प्रकट की और आगे-आगे बगीचे की ओर चला।

बगीचे में खूब अँधेरा छाया हुआ था और अंधकार में निर्दयी पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था। वृक्षों से ओस की बूँदे टप-टप नीचे टपक रही थीं । एकाएक एक झोंका मेहँदी के फूलों की खूशबू लिए हुए आयाज। हल्कू ने कहा-कैसी अच्छी महक आई झबरू! तुम्हारी नाक में भी तो सुगंध आ रही हैं?
झबरा को कहीं जमीन पर एक हडडी पड़ी मिल गई थी। उसे चिंचोड़ रहा था।

हल्कू ने आग जमीन पर रख दी और पत्तियों बटोरने लगा। जरा देर में पत्तियों का ढेर लग गया था। हाथ ठिठुरे जाते थें। नगें पांव गले जाते थे। और वह पत्तियों का पहाड़ खड़ा कर रहा था। इसी अलाव में वह ठंड को जलाकर भस्म कर देगा । 

थोड़ी देर में अलाव जल उठा। उसकी लौ ऊपर वाले वृक्ष की पत्तियों को छू-छूकर भागने लगी। उस अस्थिर प्रकाश में बगीचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थें, मानो उस अथाह अंधकार को अपने सिरों पर सँभाले हुए हों। अन्धकार के उस अनंत सागर में यह प्रकाश एक नौका के समान हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था।

हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था। एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों पॉवं फैला दिए, मानों ठंड को ललकार रहा हो, तेरे जी में आए सो कर। ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था ।

उसने झबरा से कहा-क्यों झब्बर, अब ठंड नहीं लग रही है?

झब्बर ने कूँ-कूँ करके मानो कहा-अब क्या ठंड लगती ही रहेगी?

पहले से यह उपाय न सूझा, नहीं इतनी ठंड क्यों खाते।

झबरा ने पूँछ हिलायी ।

अच्छा आओ, इस अलाव को कूदकर पार करें। देखें, कौन निकल जाता है। अगर जल गए बच्चा, तो मैं दवा न करूँगा।

झब्बर ने उस अग्नि-राशि की ओर कातर नेत्रों से देखा !

मुन्नी से कल न कह देना, नहीं लड़ाई करेगी। यह कहता हुआ वह उछला और उस अलाव के ऊपर से साफ निकल गया। पैरों में जरा लपट लगी, पर वह कोई बात न थी। झबरा आग के गिर्द घूमकर उसके पास आ खड़ा हुआ । 
हल्कू ने कहा-चलो-चलों इसकी सही नहीं ! ऊपर से कूदकर आवो। वह फिर कूदा और अलाव के इस पार आ गया। 

4

पत्तियॉँ जल चुकी थीं। बगीचे में फिर अँधेरा छा गया था। राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाकी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर जरा जाग उठती थी, पर एक क्षण में फिर ऑंखे बन्द कर लेती थी!
हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ एक गीत गुनगुनाने लगा। उसके बदन में गर्मी आ गई थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाए लेता था । 

झबरा जोर से भूँककर खेत की ओर भागा । हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुण्ड खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुण्ड थाज। उनके कूदने-दौड़ने की आवाजें साफ कान में आ रही थी। फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रहीं है। उनके चबाने की आवाज चर-चर सुनाई देने लगी।

उसने दिल में कहा-नहीं, झबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता। नोच ही डाले। मुझे भ्रम हो रहा है। कहॉँ! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता। मुझे भी कैसा धोखा हुआ!
उसने जोर से आवाज लगायी-झबरा, झबरा।

जबरा भूँकता रहा। उसके पास न आया।

फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना जहर लग रहा था। कैसा दँदाया हुआ बैठा था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला।
उसने जोर से आवाज लगायी-हिलो! हिलो! हिलो!

झबरा फिर भूँक उठा। जानवर खेत चर रहे थे। फसल तैयार हैं। कैसी अच्छी खेती थी, पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किए डालते हैं।
हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन कदम चला, पर एकाएक हवा कस ऐसा ठंडा, चुभने वाला, बिच्छू के डंक का-सा झोंका लगा कि वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा। 

झबरा अपना गला फाड़ डालता था, नील गाये खेत का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था । अकर्मण्यता ने रस्सियों की भॉति उसे चारों तरफ से जकड़ रखा था। 
उसी राख के पस गर्म जमीन पर वही चादर ओढ़ कर सो गया । 
सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ धूप फैली गई थी और मुन्नी कह रही थी-क्या आज सोते ही रहोगें? तुम यहॉ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया। 

हल्कू न उठकर कहा-क्या तू खेत से होकर आ रही है ?

मुन्नी बोली-हॉँ, सारे खेत कासत्यनाश हो गया। भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहॉ मँड़ैया डालने से क्या हुआ?

हल्कू ने बहाना किया-मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी हैं। पेट में ऐसा दरद हुआ, ऐसा दरद हुआ कि मै ही जानता हूँ!

दोनों फिर खेत के डॉँड पर आये। देखा सारा खेत रौदां पड़ा हुआ है और झबरा मॅड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों । 
दोनों खेत की दशा देख रहे थें। मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था।

मुन्नी ने चिंतित होकर कहा-अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।

हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा-रात को ठंड में यहॉ सोना तो न पड़ेगा।


कहानी:प्रेमचन्द
पाठ:मेराज अहमद