शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009

सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

क्यूँ करते हो हैरान प्रीतम फूल कहाँ से लाऊँ…नैयरा नूर

क्यूँ करते हो हैरान प्रीतम फूल कहाँ से लाऊँ
मै अकेली बोलो अब किसके बाग़ में जाऊँ
गायिका: नैयरा नूर

तेरी मौजूदगी में तेरी दुनिया कौन देखेगा…मुन्नी बेगम

मुन्नी

तेरी मौजूदगी में तेरी दुनिया कौन देखेगा

तुझे मेले में सब देखेगें मेला कौन देखेगा

गायिका: मुन्नी बेगम

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

ठाकुर का कुँआ- कहानी प्रेमचन्द

ठाकुर

दलित जीवन की त्रासदी पर आधारित प्रस्तुत कहानी हिन्दी की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है।

कहानीकार : प्रेमचन्द

स्वर : मेराज अहमद

ठाकुर का कुआँ

जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई। गंगी से बोला-यह कैसा पानी है? मारे बास के पिया नहीं जाता। गला सूखा जा रहा है और तू सड़ा पानी पिलाए देती है!

गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी। कुआं दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था। कल वह पानी लायी, तो उसमें बू बिलकुल न थी, आज पानी में बदबू कैसी! लोटा नाक से लगाया तो सचमुच बदबू थी। जरुर कोई जानवर कुएँ में गिरकर मर गया होगा, मगर दूसरा पानी आवे कहां से?

ठाकुर के कुंए पर कौन चढ़नें देगा? दूर से लोग डाँट बताएँगे। साहू का कुआँ गाँव के उस सिरे पर है, परन्तु वहाँ कौन पानी भरने देगा? कोई कुआँ गाँव में नहीं है।
जोखू कई दिन से बीमार हैं। कुछ देर तक तो प्यास रोके चुप पड़ा रहा, फिर बोला-अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता। ला, थोड़ा पानी नाक बंद करके पी लूं।

गंगी ने पानी न दिया। खराब पानी से बीमारी बढ़ जाएगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देने से उसकी खराबी जाती रहती हैं। बोली-यह पानी कैसे पियोंगे? न जाने कौन जानवर मरा हैं। कुएँ से मै दूसरा पानी लाए देती हूँ।

जोखू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा-पानी कहाँ से लाएगी?

ठाकुर और साहू के दो कुएँ तो हैं। क्यों एक लोटा पानी न भरन देंगे?

हाथ-पांव तुड़वा आएगी और कुछ न होगा। बैठ चुपके से ब्राहम्ण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक का पांच लेगें। गरीबी का दर्द कौन समझता हैं? हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झाँकनें नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएँ से पानी भरने देंगें।?

इन शब्दों में कड़वा सत्य था। गंगी क्या जवाब देती, किन्तु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया ।

2

रात के नौ बजे थे।। थके-माँदे मजदूर तो सो चुके थें, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पाँच बेफिक्रे जमा थें मैदान में। बहादुरी का तो न जमाना रहा है, न मौका। कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं। कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार से एक खास मुकदमे की नकल ले आए । नाजिर और मोहतिमिम, सभी कहते थें, नकल नहीं मिल सकती। कोई पचास माँगता, कोई सौ। यहाँ बे-पैसे-कौड़ी नकल उड़ा दी। काम करने ढँग चाहिए।

इसी समय गंगी कुएँ से पानी लेने पहुँची।

कुप्पी की धुँधली रोशनी कुएँ पर आ रही थी। गंगी जगत की आड़ मे बैठी मौके का इंतजार करने लगी। इस कुँए का पानी सारा गाँव पीता हैं।। किसी के लिए रोका नहीं, सिर्फ ये बदनसीब नहीं भर सकते ।

गंगी का विद्रोही दिल रिवाजी पाबंदियों और मजबूरियों पर चोटें करने लगा-‘हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊचें हैं? इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं? यहाँ तो जितने है, एक-से-एक छँटे हैं।। चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें। अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिए की भेड़ चुरा ली थी और बाद में मारकर खा गया।। इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते हैं। काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है। किस-किस बात में हमसे ऊँचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊँचे है, हम ऊँचे।। कभी गाँव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आँख से देखने लगते हैं। जैसे सबकी छाती पर साँप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊँचे हैं!’

कुएँ पर किसी के आने की आहट हुई।। गंगी की छाती धक-धक करने लगी। कहीं देख ले तो गजब हो जाए । एक लात भी तो नीचे न पड़े उसाने घड़ा और रस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अँधरे साए में जा खड़ी हुई । कब इन लोगों को दया आती है किसी पर! बेचारे महगू को इतना मारा कि महीनो लहू थूकता रहा। इसीलिए तो कि, उसने बेगार न दी थी। इस पर ये लोग ऊँचे बनते हैं?

कुएँ पर स्त्रियाँ पानी भरने आयी थी। इनमें बात हो रही थीं ।

खाना खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओं। घड़े के लिए पैसे नहीं है।

हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती हैं।

हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियाँ ही तो हैं।

लौंडिया नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं? दस-पाँच रुपये भी छीन-झपटकर ले ही लेती हो। और लौंडिया कैसी होती हैं?
मत जलाओं, दीदी! छिन-भर आराम करने को तो जी तरसकर रह जाता है। इतना काम किसी दूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती। ऊपर से वह एहसान मानति! यहॉं काम करते-करते मर जाओं, पर किसी का मुँह ही सीधा नहीं होता।

दानों पानी भरकर चली गई, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुएँ की जगत के पास आयी। बेफिक्रे चले गऐ थें। ठाकुर भी दरवाजा बंदर कर अंदर आँगन में सोने जा रहे थें। गंगी ने क्षणिक सुख की साँस ली। किसी तरह मैदान तो साफ हुआ। अमृत चुरा लाने के लिए जो राजकुमार किसी जमाने में गया था, वह भी शायद इतनी सावधानी के साथ और समझ्-बूझकर न गया हो। गंगी दबे पाँव कुएँ की जगत पर चढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ ।

उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला। दाएँ-बाएँ चौकन्नी दृष्टी से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रु के किले में सूराख कर रहा हो। अगर इस समय वह पकड़ ली गई, तो फिर उसके लिए माफी या रियायत की रत्ती-भर उम्मीद नहीं। अंत मे देवताओं को याद करके उसने कलेजा मजबूत किया और घड़ा कुऍं में डाल दिया ।

घड़े ने पानी में गोता लगाया, बहुत ही आहिस्ता। जरा-सी आवाज न हुई। गंगी ने दो-चार हाथ जल्दी-जल्दी मारे। घड़ा कुएँ के मुँह तक आ पहुँचा। कोई बड़ा शहजोर पहलवान भी इतनी तेजी से न खींच सकता था।
गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखे कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाजा खुल गया। शेर का मुँह इससे अधिक भयानक न होगा।

गंगी के हाथ रस्सी छूट गई। रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं ।

ठाकुर कौन है, कौन है? पुकारते हुए कुएँ की तरफ जा रहे थें और गंगी जगत से कूदकर भागी जा रही थी ।

घर पहुँचकर देखा कि जोखू लोटा मुंह से लगाए वही मैला गंदा पानी पी रहा है।

*

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

सितम भि सहना, दुआ भी देना- मुन्नी बेगम की आवाज़

सितम

सितम भी सहना, दुआ भी देना।

है बेबसी का गया ज़मान॥

अगर है जुर्रत, गिराओ बिजली।

बना रहा हूं नया ठिकाना॥

शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

हाथ दिया उसने मेरे हाथ में- मुन्नी बेगम

मुन्नी

हाथ दिया उसने मेरे हाथ में।

मैं तो वली बन गया इक रात मे॥

इश्क़ बुरी शै सही पर दोस्त।

दख्ल न दो तुम मेरी हर बात में॥

गायिका: मुन्नी बेगम