गुरुवार, 2 जून 2011

अहले देर-ओ-हरम रह गए... मुन्नी बेगम

अहले देर--हरम रह गए
अहले देर-ओ-हरम रह गए
तेरे दीवाने कम रह गए

उनकी हर शै संवारी मगर
फिर भी जुल्फों में ख़म रह गए

देखकर उनकी तस्वीर को
आईना बनके हम रह गए

बेतकल्लुफ़ वो ग़ैरों से हैं
नाज़ उठाने को हम रह गए

हमसे पी कर उठा न गया
लड़खड़ा के क़दम रह गए

मिट गए मंजिलों के निशां
सिर्फ़ नक्श-ए-क़दम रह गए

पास मंज़िल के मौत आ गयी
जब सिर्फ़ दो क़दम रह गए

अहले देर-ओ-हरम रह गए
तेरे दीवाने कम रह गए

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